How Dubai is Making Artificial Rain

851

Dubai को दुनिया में ऐशो आराम व शानो शौकत का दूसरा नाम माना जाता है। लेकिन क्या आपको मालूम है कि हर तरह की सुख सुविधाओं से भरा हुआ नजर आने वाला दुबई अंदर से पूरी तरह सूखा हुआ है। असल में दुबई पूरा रेगिस्तान पर बसा हुआ है जिसके कारण वहां पीने के पानी का कोई भी प्राकृतिक स्रोत मौजूद नहीं है और इसीलिए दुबई पीने के पानी का इन्तजाम करने के लिए Cloud seeding नाम की एक Artificial Rain technology की मदद लेता है।

आज की हमारी इस article में भी हम आपको यही बताने वाले हैं कि दुबई आखिर इस टेक्नॉलजी की मदद से अपने लिए पानी का इन्तजाम किस तरह से करता है और साथ ही आपको यह भी समझाएंगे कि आनेवाले समय में यह Artificial Rain technology हमारे भारत के लिए एक बहुत बड़ा खतरा कैसे बन सकती है। तो चलिए अब इस interesting article को शुरू करते हैं।

1. Basics Information About Dubai:

Dubai United Arab Emirat यानि की UAE के 7 अमिरातो में से एक है। इस शहर को दुनिया के सबसे मशहूर और सबसे महंगे शहरों में शुमार किया जाता है क्योंकि इस शहर का अपना एक ऐसा आकर्षण है कि दुनिया भर के लोग इसके तरफ़ खिंचे चले आते हैं लेकिन ऊपर से खुशहाल और संपन्न नज़र आने वाला ये शहर अंदर से पूरी तरह सूखा हुआ है।

दरअसल दुबई एक सूखे हुए रेगिस्तान के ऊपर बसा है जहां पीने के पानी का एक कतरा भी मौजूद नहीं है और तो और यहां बारिश भी पूरे साल में सिर्फ 5 से 10 बार होती है जो कि दुबई की पानी की समस्या को हल करने के लिए काफी नहीं। अब वैसे तो समुद्र के किनारे बसा होने के कारण दुबई के पास पानी की कोई कमी नहीं है लेकिन समुद्र का पानी खारा होता है जिसके चलते इसको पीया नहीं जा सकता।

अगर कोई इंसान इस खारे पानी को लगातार पीले। तो फिर इससे उसकी मौत भी हो सकती है। अब सवाल आता है कि दुबई आखिर पीने के पानी का इन्तजाम किस तरह से करता है। असल में दोस्तों दुबई के अंदर पानी को शुद्ध करने वाले बहुत से बड़े बड़े desalination plant बनाये गये हैं और इन प्लांट्स के अंदर समुद्र के खारे पानी से नमक को दूर करके उसको पीने के लायक बनाया जाता है।

लेकिन ये प्रोसेस सुनने में जितना आसान लगता है असल में उससे कहीं ज्यादा complex है क्योंकि दिन रात चलने वाले इन प्लांट्स को बेशुमार ऊर्जा की जरुरत पड़ती है जिसके चलते इनको चलाने का खर्चा बहुत ही ज्यादा हो जाता है। एक आंकड़े के अनुसार इन प्लांट में 1000 लीटर पानी को फिल्टर करने का खर्चा 60 डॉलर यानि कि लगभग 4400 रुपये तक का होता है।

2. Artificial Rain with Cloud Seeding:

Artificial Rain

अब जाहिर सी बात है कि पानी के लिए इतना ज्यादा खर्चा झेलना किसी भी सरकार के बस की बात नहीं है इसीलिए दुबई सरकार भी किसी ऐसे solution की खोज कर रही थी जो कि इन्हें इस खर्चे से बचा सके और फिर दुबई को यह solution Cloud seeding technology के रूप में प्राप्त हुआ। अब आप में से बहुत सारे लोग Cloud seeding के बारे में तो पहले से ही जानते होंगे लेकिन जो लोग नहीं जानते उन्हें हम बता दें इस technology का इस्तमाल artificial rain यानि के कृत्रिम रूप से बारिश करवाने के लिए किया जाता है।

अब dubai इस technology का इस्तेमाल अपनी पानी की समस्या को दूर करने के लिए कैसे करता है और ये technology आखिर किस तरह से काम करती है इसको समझने के लिए चलिए पहले हम आपको बारिशहोने का basic concept बताते हैं। सूरज की किरणें जब पृथ्वी की सतह पर मौजूद पानी पर पड़ती हैं तो फिर वह पानी भाप बनकर ऊपर उठने लगता है और चूंकि ऊपर का टेम्प्रेचर ठंडा होता है इसीलिए यह भाप ऊपर जाकर फिर से पानी की छोटी छोटी बूंदों में बदल जाती है

पानी की इन बेहद छोटी बहनों को अंग्रेजी भाषा में droplets कहा जाता है जोकि पाने की pure form होती है। पानी के ये टॉयलेट से ऊपर इकट्ठा होकर बादलों का रूप ले लेते हैं। साथी बेहद छोटी होने की वजह से ये बहुत ज्यादा हल्की भी होती है और ये नीचे जमीन पर तब तक नहीं गिरती जब तक कि ये आपस में जोड़कर बड़ी बूंदों का रूप न धारण कर ले। अब चूंकि ये पानी की pure form हैं।

इसलिए ये एक दूसरे के साथ जोड़ती भी नहीं हैं लेकिन जब इन droplets से धुएं या फिर धूल के कण टकराते हैं तो फिर ये purest form में नहीं रह जाती और एक दूसरे के साथ जुड़ने शुरू हो जाती हैं और फिर जैसे ही इनका वजन बढ़ता है तो फिर ये बूंद के रूप में ग्रैविटी की वजह से नीचे जमीन पर गिरने लगती है जिसको कि हम लोग Rain कहते हैं।

3. What is Cloud Seeding Technology:

यह था प्राकृतिक रूप से बारिश होने का basic concept। अब अगर Cloud seeding की बात करें तो इस technology को साल 1946 में अमेरिकी वैज्ञानिक विल्सन शेफर्ड के द्वारा डेवलप किया गया था। बेसिकली यह एक ऐसी टेक्नॉलजी है जो बादलों में मौजूद छोटे छोटे droplets को आपस में जोड़ने का काम करती है और जैसा कि हमने आपको बताया कि जब पानी केवल से आपस में जुड़ते हैं तो फिर बारिश होनी शुरू हो जाती है। दरअसल इस

Technology में silver iodide नामका एक रासायनिक कंपाउंड बादलों के ऊपर छिड़का जाता है और इसको छिड़कने के लिए या तो प्लेन का इस्तेमाल किया जाता है या फिर ये जमीन से भी स्पेशल किस्म के जनरेटर के द्वारा बादलों में भेजा जाता है। अब ये रासायनिक कंपाउंड जब बादलों में जाता है तो फिर ये छोटे छोटे टॉयलेट्स को आपस में जोड़कर बड़ी बूंदों में बदल लेता है।

इससे कि बारिश होनी शुरू हो जाती है और इसीलिए कह सकते हैं कि क्लाउड सीडिंग एक ऐसी technology है क्योंकि बादलों को Artificial Rain करने के लिए फोर्स करती है और इस टेक्नॉलजी का इस्तेमाल कई दशकों से सफलतापूर्वक किया भी जा रहा है और आज इसकी मदद से सिर्फ बारिश ही नहीं बल्कि Artificial रूप से बर्फबारी करना भी संभव हो चुका है।

अब हम आपको बताते हैं कि दुबई आखिर क्लाउड सीडिंग का इस्तेमाल किस तरह से करता है। दरअसल दुबई सरकार ने hajar mountains में hatta नाम का एक डैम बनाया हुआ है और फिर जब समुद्र से उठने वाले बादल hajar mountains में जाते हैं तब दुबई उन बादलों में क्लाउड सीडिंग करता है और जब इस क्लाउड सीडिंग से पहाड़ों पर बारिश होती है तो बारिश का वो पानी पहाड़ों से नीचे बहते हुए समुद्र में जाने की जगे इस डैम के अंदर जमा हो जाता है।

फिर इस जमे हुए पानी का इस्तमाल दुबई ना सिर्फ पीने के लिए करता है बल्कि इसके जरिए बिजली का निर्माण भी किया जाता है। अब जहां डिसेलिनेशन प्लान्ट में 1000 लीटर पानी को फिल्टर करने का खर्चा 4400 रुपये के आसपास आता था वहीं आज क्लाउड सीडिंग की मदद से यह काम सिर्फ 70 से 75 रुपये में हो जाता है और इस तरह से दुबई आधुनिक।

4. Effects of Cloud Seeding Technology:

टेक्नॉलजी की मदद से अपने यहां पीने के मीठे पानी का इन्तजाम करता है जोकि वाकई में अद्भुत है। दोस्तो क्लाउड सीडिंग यूं तो एक बहुत ही उपयोगी टेक्नोलॉजी है जिसका इस्तमाल दुबई की तरह ही दुनिया के और भी कई हिस्सों में अच्छे कामों के लिए किया जा रहा है लेकिन इसकी एक सबसे बड़ी खामी यह है कि इसका इस्तेमाल हथियार के रूप में भी किया जा सकता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें साल 1955 से 1975 के बीच लड़े गए वियतनाम युद्ध में अमेरिका ने वियतनाम के खिलाफ क्लाउड सीडिंग का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया था।

दरअसल अमेरिका के सिपाही हर साल मानसून के सीजन के दौरान वियतनाम के बादलों में क्लाउड सीडिंग करते थे जिससे कि वहां पर ताबड़ तोड़ Artificial Rain आने की वजह से भयंकर बाढ़ और भूस्खलन जैसी समस्याएं बढ़ जाती थी और इस बाढ़ की वजह से सारे रास्ते जाम हो जाते थे जिससे के वियतनाम के मिलिट्री सप्‍लाई पूरी तरह से ठप पड़ जाती थी। अमेरिका ने अपने इस ऑपरेशन को operation popai नाम दिया था। अब यूं तो अमेरिका इस हथियार का निशाना सिर्फ वियतनाम के सिपाहियों को ही बनाना चाहता था लेकिन इसके इस्तेमाल से बहुत सारे बेगुनाह लोग भी मारे गए थे।

इसके लिए 1976 में एनवायरमेंटल मॉडिफिकेशन कन्वेशन नाम की एक संधि बनायी गयी थी जिसमें कि यह तय किया गया कि भविष्य में कभी भी युद्ध के दौरान इस तरह के हथियार का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा और इस संधि में कुल 78 देशों ने साइन किया था जिसमे की भारत, पाकिस्तान, चीन, अमेरिका, और जापान जैसे देशों के नाम शामिल हैं। दोस्तो अब आखिर में हम बात करते हैं एक क्लाउड सीडिंग टेक्नोलॉजी भारत के लिए नुकसानदेह कैसे साबित हो सकती है।

असल में भारत के इस डर की वजह कोई और नहीं बल्कि हमारा पड़ोसी देश चीन है क्योंकि चीन का यह कहना है कि वो वेदर मॉडिफिकेशन की एक ऐसी एडवांस टेक्नोलॉजी को बनाने पर काम कर रहा है जिससे कि साल 2025 तक वह अपने एक तिहाई देश के मौसम को पूरी तरह से अपने कंट्रोल में ले लेगा और इस टेक्नोलॉजी को लेकर चीन इतना ज्यादा serious है की इसके फिर रिसर्च पर ही वह 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर चुका है।

5. Experts Opinion:

अब एक्सपर्ट्स की मानें तो उनका कहना है कि अगर चीन अपने इस प्रोग्राम में सफल हो जाता है तो उसके वेदर कंट्रोल करने का निगेटिव इफेक्ट हमारे भारत के कश्मीर और लद्दाख जैसे कई सारे हिस्सों में देखने को मिल सकता है। इसके अलावा अनुमान यह भी है कि अगर चीन के हाथ में मौसम का इतना कंट्रोल आ गया तो फिर भारत के जो हिस्से चीन के बॉर्डर से सटे हुए हैं वहां पर चीन अपनी मर्जी से जितनी चाहें उतनी बारिश करवा सकता है या फिर रुकवा भी सकता है लेकिन दोस्तों सभी को यह याद रखना चाहिए कि इतिहास गवाह है।

इंसानों ने जब भी प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश की है तो फिर उसके बहुत भयंकर परिणाम सामने आए हैं। ऐसे में चीन का इतने बड़े लेवल पर मौसम को अपने कंट्रोल में लेना बहुत ही ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। और क्या पता। चीन के ऐसा करने का खामियाजा हमारे देश को भी चुकाना पड़ जाए तो दोस्तों यह थी क्लाउड सीडिंग और उससे संबंधित जानकारियां। आपको यह article कैसी लगी हमें कमेंट करके बताना ना भूलिएगा। आपका बहुमूल्य समय देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।